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बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई _विपिन दिलवरिया

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बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई खुशियों की इस घड़ी में जाने क्यों आज मेरी आँख भर आई बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई जाने क्यों जहन में आज बीते दिनो की बात लौटकर आई मिन्नतो बाद वो रात आई श्रावण माह वो बरसात आई चहल पहल थी घर पर मेरे  घर में जमा थी खूब लुगाई वो पल मेरे समझ ना आया सब चहरों पर हंसी आई जब रोने की एक आवाज आई एक अलग सा शोर हुआ  और सब नें दी बधाई देखो घर में तुम्हारे  बिटिया आई बिटिया आई खिल उठी थी वो आँगनाई जब नन्हें पैर तेरे  खुशियों की सौगात लाई कदम पड़े थे घर में तेरे जब घर में थे हम भाई भाई खुशियों की इस घड़ी में जाने क्यों आज मेरी आँख भर आई बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई याद है तुझे वो कहानियाँ याद है तुझे वो शैतानियाँ जब  खेल-खेल  में   हम  करते थे बेईमानियाँ याद है वो बचपन की लड़ाई याद है वो बचपन की पिटाई याद है वो जब लैम्प के चारो  ओर बैठकर हम करते थे पढाई याद है वो पिताजी का पढाना  किताब लेकर जबरदस्ती बैठना याद है वो पढते पढते सो जाना और पिताजी की एक  आवाज पर नींद का उड़ जाना हँसते खेलते लड़ते झगड़ते  जाने  ...

Part - 11 - Thoughtfull Shayari __ Vipin Dilwarya

        Thoughtfull Shayari (1) गलतफहमी रखते है जो,  उन्हें बता दूँ ये सियासत अब वो पुरानी नहीं रही ये 21 वीं सदी का क्रन्तिकारी युग है अब वो 20 वीं सदी वाली बात पुरानी नहीं रही जागीर समझ बैठे है जो दिल्ली को,  उन्हें बता दूँ  ये दिल्ली किसी की खानदानी नहीं रही (2) घना  कोहरा  ठंड  बढ़ रही है  गरीबी फुटपात पर मर रही है ना सर पर छत है ना तन पर कपड़ा  जिसके सहारे  जीने  की उम्मीद थी वो धूप निकलने से डर रही है (3) चाहो तो बदल सकता है उनका नज़रिया तुम्हारे लिये ख़ुद एक बर बदलकर तो देखो ख़ुद ब ख़ुद संभल जाएगा ये ज़माना ख़ुद एक बार संभलकर तो देखो (4) देखो ये  जी  का  जंजाल  बन गया है,,! ये जनसैलाब आज सवाल बन गया है,,!! गुस्ताखी कर बैठी है ये हवायें दियो से,,! देखो ये दिया आज मशाल बन गया है,,!! (5) बहारें गयी अब ख़िज़ां चल रही है,,,,,,,,,,,,,,,,,,! कोई बताओ हुक्मरानों को फ़िज़ा बदल रही है,,!! (6) एक तरफ जवान है , एक तरफ किसान है  दोनों इस मिट्टी पर छिडकते अपनी जान है क्यों आमने-सामने  है  वो आज य...

ये कैसा लोकतन्त्र है ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

  ये कैसा लोकतन्त्र है जहाँ सच्चाई छुपाई जाती है  झूँठी खबर दिखाई  जाती है उसे प्रजातंत्र कहुँ  या राजतंत्र, जहाँ  हर  उठती  आवाज़  दबाई  जाती है ये कैसा लोकतन्त्र है जहाँ निहत्थो पर पानी  की  बौछारें  और  लाठिया चलायी जाती है तस्वीर जलाना वहाँ कोई बड़ी बात नहीं, जहाँ आधी रात बेटियां जलायी जाती है __विपिन दिलवरिया 

मैंने पूछा ज़िन्दगी क्या है ? __ विपिन दिलवरिया

         मैंने पूछा ज़िन्दगी क्या है ? मैंने पूछा ज़िन्दगी क्या है ? किसी ने कहा नरक ,  किसी ने कहा जन्नत किसी ने कहा गम , किसी ने कहा मोहब्बत किसी ने कहा दुआ ,किसी ने कहा बददुआ  किसी ने कहा मौका , किसी ने कहा धौखा किसी ने कहा नियम , किसी ने कहा सयंम किसी ने कहा श्रम, किसी ने कहा मतिभ्रम  किसी ने  कहा  ज़िन्दगी का नाम जिहान है  किसी ने कहा ज़िन्दगी का नाम इम्तिहान है किसी ने  कहा  सफ़र  मंजिले-ए-ज्ञान का किसी ने कहा सफ़र मंजिले-ए-निर्वाण का लोग कहते गये और मैं सुनता गया मगर मैं ज़िन्दगी को कभी समझ ना पाया अन्तिम साँस तक शब्द चुनता गया मगर ज़िन्दगी को परिभाषित कर ना पाया   __विपिन दिलवरिया ( मेरठ )

ये मेरा हिन्दुस्तान है ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

                 ये मेरा हिन्दुस्तान है शौर्य की मिसाल है  तिरंगा जिसकी पहचान है ये मेरा हिन्दुस्तान है सीने पर गोली खायी आज़ादी की अलख जगाई इस मिट्टी में जन्मे  सुभाषचंद्र बोस,भगतसिंह  राजगुरु,सुखदेव जैसे इन्सान है इस मिट्टी पर अपनें खून से  लिक्खी आज़ादी की दास्तान है  ये मेरा हिन्दुस्तान है ना कभी हम घबराये ना कभी कदम डगमगाये बैठे सरहद पर सीना तान है ऐसे मेरे देश के जवान है ये मेरा हिन्दुस्तान है भाईचारे की मिसाल है सर्वधर्म है मेरा भारत यहाँ हिन्दु है मुसलमान है पनाह दी हर मज़हब को  ऐसा मेरा भारत महान है एक घर में रहती  यहाँ गीता और कुरान है ये मेरा हिन्दुस्तान है इस मिट्टी में जन्में श्याम  इस मिट्टी में जन्में राम है इस मिट्टी में जन्में महावीर स्वामी इस मिट्टी में जन्में बुद्ध भगवान है ये मेरा हिंदुस्तान है इस मिट्टी में जन्में गाँधी, फूले और पटेल इस मिट्टी में जन्में भीमराव  अम्बेडकर जैसे विद्वान है ये मेरा हिन्दुस्तान है इस मिट्टी में जन्में  वाग्भट, मिहिर, आर्यभट्ट इस मिट्टी में जन्में ...

ये सियासत अब वो पुरानी नहीं रही ( shayari ) __विपिन दिलवरिया

                ये सियासत अब वो                         पुरानी नहीं रही गलतफहमी रखते है जो,  उन्हें बता दूँ ये सियासत अब वो पुरानी नहीं रही ये 21 वीं सदी का क्रन्तिकारी युग है अब वो 20 वीं सदी वाली बात पुरानी नहीं रही जागीर समझ बैठे है जो दिल्ली को,  उन्हें बता दूँ  ये दिल्ली किसी की खानदानी नहीं रही __विपिन दिलवरिया 

सुख की तितली के पीछे मात भागो ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

सुख की तितली के पीछे मात भागो सुख की तितली के पीछे मात भागो ये रोज नये फूलो को चुनती है भाग्य की लकीरो के पीछे मत भागो ये रोज नये ख्वाबों को बुनती है परिश्रम के समंदर से सींचकर एक बागवाँ बनाओं जहाँ मधुकर चकरी तितलियाँ सब मंडराती है __विपिन दिलवरिया