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दो गज़ ज़मीं मेरे नाम आई ( शायरी ) __गाज़ी आचार्य ' गाज़ी '

दो गज़ ज़मीं मेरे नाम आई देखो आज वो शाम आई  मेरे हिस्से खुशियाँ तमाम आई एक माँ का दामन छूटा तो अपनी बाहें पसारे धरती माँ आई  ज़मींदारी लेकर आई मेरी शहीदी, आज दो गज़ ज़मीं मेरे नाम आई खुशकिस्मत हुँ मैं वतन तेरे लिये, मेरे  ज़िस्म  की  मिट्टी काम आई  __गाज़ी आचार्य ' गाज़ी ' 

Part - 8 - Heart broken💔shayari __Ghazi Acharya

Heart broken💔shayari (1) बहुत कुछ गवांया है एक तेरे लिये घर से बेघर हो गया हुँ एक तेरे लिये अब भी खत्म नहीं हुई तेरी ख्वाहिशे अब क्या दुनिया छोड़ दूँ एक तेरे लिये (2) ये तेरा इश्क़ सजिशों का हिस्सा है,,!!  जिसमें  सिर्फ  मेरा  किस्सा  है,,,,,,!! (3) मेरी लकीरें अधूरी तेरे बिना है,,! मुझे जीना फिर भी तेरे बिना है,,!! लिक्खी है बस हिज़्र की कहानी,, मेरी किस्मत है कि मेरा नाम हिना है,,!! (4) डरना मंजूर नहीं था फिर भी डरा हुआ हुँ मैं,,! मरना मंजूर नहीं था फिर भी मरा हुआ हुँ मैं,,!! (5) झूँठ कहता हुँ  कि मैं मस्त हुँ तेरे जाने से मैं अस्त व्यस्त हुँ (6) नज़रें तो उनकी आज भी झुक जाती है,,,!! वो बात अलग है कि  अदब से नहीं आज शर्म से झुक जाती है,,!! (7) अब तेरे बिना जीना पड़ेगा माँ तेरे जैसा प्यार कौन करेगा माँ सर से तेरा साया छूट गया अब मेरे कष्टो को कौन हरेगा माँ (8) मोहब्बत नहीं कुछ लोग आजमाईश करते है  वफ़ा के नाम पर जिस्मों की नुमाईश करते है सस्ता नशा करके गुज़रती है जिसकी ताऊम्र मुफ्त  की  मिले  तो वो भी फर्माईश करते है (9) नजरें झुकी है तो...

बस इतना सा करना है __गाज़ी आचार्य 'गाज़ी '

      बस इतना सा करना है काटने वाले काटते रहेंगे  बीज नफरतों के बो देना तेरा क्या  जाता है इसमें जमा किया  जो भी  बाप ने  वो  सब खो देना अपनी ज़िन्दगी ऐश में है हमे  औरों  से  क्या लेना  बस  इतना सा  करना है बात निकल जाये जब हाथ से तो बाद में रो देना __गाज़ी आचार्य ' गाज़ी '

मैं परेशान हुँ ( हिन्दी कविता ) __गाज़ी आचार्य ' गाज़ी '

                      मैं परेशान हुँ मैं  परेशान  हुँ  कुछ शऊरदारो से, समाज भरा पड़ा  है समझदारों से मशवरा दे जाते  है जो  राह चलते, मैं  परेशान  हुँ  ऐसे सलाहकारो से दूसरों की पैंट में खामियां बताते है, जिनका गुजारा होता है पजामों से मोल करते है  वो चांद सितारो के, जिनके घर भरे  पड़े  है  उधारो से कब  निकलेगा  इन्सान  यहाँ  इन  झूँठे  रीति  रिवाज़  परम्पराओं से अनपढ़ो से कोई गिला नहीं 'गाज़ी' मैं  परेशान  हुँ पढ़े लिखे गंवारो से __गाज़ी आचार्य 'गाज़ी'

बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई _विपिन दिलवरिया

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बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई खुशियों की इस घड़ी में जाने क्यों आज मेरी आँख भर आई बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई जाने क्यों जहन में आज बीते दिनो की बात लौटकर आई मिन्नतो बाद वो रात आई श्रावण माह वो बरसात आई चहल पहल थी घर पर मेरे  घर में जमा थी खूब लुगाई वो पल मेरे समझ ना आया सब चहरों पर हंसी आई जब रोने की एक आवाज आई एक अलग सा शोर हुआ  और सब नें दी बधाई देखो घर में तुम्हारे  बिटिया आई बिटिया आई खिल उठी थी वो आँगनाई जब नन्हें पैर तेरे  खुशियों की सौगात लाई कदम पड़े थे घर में तेरे जब घर में थे हम भाई भाई खुशियों की इस घड़ी में जाने क्यों आज मेरी आँख भर आई बड़ी रुला गई बहना आज तेरी विदाई याद है तुझे वो कहानियाँ याद है तुझे वो शैतानियाँ जब  खेल-खेल  में   हम  करते थे बेईमानियाँ याद है वो बचपन की लड़ाई याद है वो बचपन की पिटाई याद है वो जब लैम्प के चारो  ओर बैठकर हम करते थे पढाई याद है वो पिताजी का पढाना  किताब लेकर जबरदस्ती बैठना याद है वो पढते पढते सो जाना और पिताजी की एक  आवाज पर नींद का उड़ जाना हँसते खेलते लड़ते झगड़ते  जाने  ...

ये मेरा हिन्दुस्तान है ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

                 ये मेरा हिन्दुस्तान है शौर्य की मिसाल है  तिरंगा जिसकी पहचान है ये मेरा हिन्दुस्तान है सीने पर गोली खायी आज़ादी की अलख जगाई इस मिट्टी में जन्मे  सुभाषचंद्र बोस,भगतसिंह  राजगुरु,सुखदेव जैसे इन्सान है इस मिट्टी पर अपनें खून से  लिक्खी आज़ादी की दास्तान है  ये मेरा हिन्दुस्तान है ना कभी हम घबराये ना कभी कदम डगमगाये बैठे सरहद पर सीना तान है ऐसे मेरे देश के जवान है ये मेरा हिन्दुस्तान है भाईचारे की मिसाल है सर्वधर्म है मेरा भारत यहाँ हिन्दु है मुसलमान है पनाह दी हर मज़हब को  ऐसा मेरा भारत महान है एक घर में रहती  यहाँ गीता और कुरान है ये मेरा हिन्दुस्तान है इस मिट्टी में जन्में श्याम  इस मिट्टी में जन्में राम है इस मिट्टी में जन्में महावीर स्वामी इस मिट्टी में जन्में बुद्ध भगवान है ये मेरा हिंदुस्तान है इस मिट्टी में जन्में गाँधी, फूले और पटेल इस मिट्टी में जन्में भीमराव  अम्बेडकर जैसे विद्वान है ये मेरा हिन्दुस्तान है इस मिट्टी में जन्में  वाग्भट, मिहिर, आर्यभट्ट इस मिट्टी में जन्में ...

याद तेरी आती है बहुत ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

           याद तेरी आती है बहुत खुश हो जाता ज़र्रा ज़र्रा  दीवारें गुनगुनाती है बहुत घर के मेरे हर कौने को खुशबू तेरी महकाती है बहुत आ जाओ तुम लौटकर  याद तेरी आती है बहुत * * सूना है कमरा सूना है वो बिस्तर  जैसे फूलों से उड़ चले  हो तीतर  याद आती वो बाते  करते जो हम रात भर याद आती वो रातें  साथ जो गुज़ारी है बहुत आ जाओ तुम लौटकर  याद तेरी आती है बहुत * * गुज़रा जब जब उन रहों को याद  करता  तेरी  बाहों  को बाहों में आकर तेरा मिलना महसूस करता तेरी आहों को आती हो जैसे ही ख्वाबों में धड़कन मेरी बढ़ जाती है बहुत आ जाओ तुम लौटकर  याद तेरी आती है बहुत * * कह जाती है कानों में ये हवा मुझे जलाती है बहुत मुश्क़िल है बिछड़ के जीना  याद तेरी सताती है बहुत अधूरा है तुम बिन"दिलवरिया" बातें तेरी तडपाती है बहुत आ जाओ तुम लौटकर  याद तेरी आती है बहुत __ विपिन दिलवरिया ( मेरठ )

ख़ुद को बदनाम भी कर दिया ( गज़ल ) __विपिन दिलवरिया

  ख़ुद को बदनाम भी कर दिया   कोई  नाता ना  था जिसका  मैखानें से उसनें वहाँ अपना मुक़ाम भी कर दिया ज़ाम के नाम से  भी  अनजान  था जो उसने   ज़ाम  पे  ज़ाम  भी  कर  दिया जितना   बचाया  था   ज़मानें   भर  से  उसनें  ख़ुद  को  सरेआम भी कर दिया चाहत जो भी हुई पाने की, उसके लिये उसनें  सुबह  को  शाम  भी  कर  दिया लाख कोशिशे  की  समझानें  की मगर जो ना करना था वो काम भी कर दिया जितना किया  था  नाम  ज़मानें भर में उसनें  ख़ुद को  बदनाम भी  कर दिया  आँख     खुली     तो     ऐसी     खुली  उसनें यहाँ सब कुछ दान भी कर दिया इतना आसाँ   नहीं  किसी की फितरत  को     समझना     यहाँ    "दिलवरिया" बचाकर लाया था जो मुझे ज़मानें भर से उसने  ही  कत्ल-ए-आम  भी  कर...

कदम-कदम पे आफ़त हो जाती है ( गज़ल ) __विपिन दिलवरिया

  कदम-कदम पे आफ़त हो जाती है  खामोश रहता हुँ तो  खिलाफ़त हो जाती है बोलनें लगता  हुँ  तो  अदावत* हो जाती है मेरी  तकदीर   मेरे  खिलाफ़   इस  कदर है मैं साँस  भी लेता  हुँ  तो आहट हो जाती है झूँठ की  ताजपोशी करती है दुनियाँ , यहाँ सच बोलने  वालों  की बगावत हो जाती है ये कलयुग  है  यहाँ  ईमानदारी  को मनाही  और  बेईमानी  को   इजाज़त  हो  जाती है मरते देखा है  मैनें सच्चे  इश्क़ में लोगों को कैसे करू सच्चा  इश्क़  आदत हो जाती है राह-ए-दहर*इतनी आसाँ नहीं "दिलवरिया" इसमें  कदम - कदम पे आफ़त हो जाती है __विपिन दिलवरिया  बगावत  -  विद्रोह अदावत  -  शत्रुता , दुश्मनी राह-ए-दहर - जीवन का मार्ग मनाही  -  मना करने का भाव

किसे पता था मिट्टी अन्धेरें में जला दी जायेगी ( Justice_For_ManishaValmiki ) ( हाथरस गैंग रेप प्रकरण ) __विपिन दिलवरिया

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   किसे पता था मिट्टी अन्धेरें में जला दी जायेगी     ( Justice_For_ManishaValmiki )      ( हाथरस गैंग रेप प्रकरण ) किसे  पता  था  ये   घड़ी  विकट  बन जायेगी कुछ   गन्दी   नज़रें   मेरे  ऊपर  तन   जायेगी किसे   पता   था   आबरू   लूट   ली  जायेगी  गला काटकर  रीढ  की  हड्डी  तोड दी जायेगी पहले  नोच   नोचकर  खाया   सबने  मुझको किसे पता  था  बाद  जीभ  काट  दी  जायेगी खूब   लड़ी    मैं    ज़िन्दगी   मौत   से   मगर किसे पता था  ज़िन्दगी , मौत  से हार जायेगी दिन  के   उजालो   में  लुटी  थी  मेरी  आबरू किसे पता था मिट्टी अन्धेरें में जला दी जायेगी फिर होगी बहस  फिर  ह...

सबके साथ छूट गये ( hindi kavita ) __विपिन दिलवरिया

सबके साथ छूट गये दिल के सारे भ्रम टूट गये जब अपने  सारे रूठ गये मौज़-ए-ज़िन्दगी  साथ खड़े दुख में सबके साथ छूट गये कड़ी   धूप  में    छांव   दी   जिसने काट दिया जब पत्ते उसके सूख गये जिसके लिये  सब कुछ भुलाया था  आज   वो   भी    हमें   भूल   गये __विपिन दिलवरिया 

मैं फ़कत मुस्कुरा देता हुँ ( गज़ल )( शायरी ) __विपिन दिलवरिया

                  मैं फ़कत मुस्कुरा देता हुँ  अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लेता हुँ,! हौंसलों से  मैं  हालातों  को  गुलाम बना देता हुँ!! मिज़ाज़  है  मेरा  चुपचाप  सा  रहने का मगर,,! अपना पयाम*  मैं अपने  कलाम* से  देता  हुँ,!! चिल्लाकर मैं  दबाऊँ  ये  मेरी  फितरत  नहीं,,! कुछ जवाब मैं अपनी खमोशियों से दे देता हुँ,!! मेरे  लहजे  को  वो  मेरा  गुस्सा  समझतें  है,,! जब गुस्सा आता है  मैं फ़कत मुस्कुरा देता हुँ,!! यूं तो फसानें खूब  लिखे  हमनें मोहब्बतों के,,! बात जब ख़ुद की आये तो कलम रोक देता हुँ,!! उसको लगता  है  उसकी जरुरत  नहीं  मुझे,,! कैसे कहुँ  उसके बिना मैं अकेले में रो देता हुँ,!! बयां नहीं  करता  "दिलवरिया" अपनी कहानी,,! दिल का दर्द जुबाँ पे आने से पहले रोक देता हुँ!! पयाम - संदेश कलाम - वचन, उक्ति ,बातचीत __विपिन दिलवरिया ...

इन्सान कभी ना बनना चाहे ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

          इन्सान कभी ना बनना चाहे  जग में ऊँचा नाम हो जाये, पर  काम कभी  ना  करना  चाहे,,!! जीतना चाहे मौत से भी,  पर ख़ुद से  कभी ना लड़ना चाहे,,!! सब चाहे क्रांति आये, पर  भगतसिंह  कोई  ना  बनना चाहे,,!! सबको  देशभक्ति  का   पाठ   पढाये , पर ख़ुद पासबान भी ना बनना चाहे,,!! धर्मों की जो लड़ाई लड़ते, गीता क़ुरान कभी ना पढना चाहे,!! बनना चाहे हिन्दु मुस्लिम, पर इन्सान कभी ना बनना चाहे,,!! चाहता है बस पुण्य कमाए, पर  दान  कभी  ना  करना चाहे,,!! वधु  चाहिये  सबको सीता   जैसी  "दिलवरिया" पर ख़ुद राम कभी ना बनना चाहे,!! __विपिन दिलवरिया 

शिक्षक ( शिक्षक क्या है ? ) __विपिन दिलवरिया

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शिक्षक   शिक्षक क्या है ? शिक्षक निराकार है शिक्षक का नाम संस्कार है शिक्षक फ़ज़ल है शिक्षक कोरे कागज़ को  ज्ञान रुपी शब्दो से सवारनें वाली एक कलम है शिक्षक जीवन की उम्मीद अच्छे भविष्य की आस है शिक्षक चिराग है शिक्षक संगतराश है शिक्षक जलते दिये की लॉ  जीवन को उज्ज्वल करती मशाल है शिक्षक अदब की पहचान है शिक्षक कोई इन्सान नहीं  इन्सान रुपी भगवान है __विपिन दिलवरिया  अदब  -  सभ्यता , आदर सत्कार फ़ज़ल - श्रेष्ठता , गुण  निराकार - आकाश , ईश्वर को भी निराकार कहा गया है

छोड़ दी वो राह-ए-मोहब्बत (गज़ल) (shayarai) __विपिन दिलवरिया

                          छोड़ दी वो राह-ए-मोहब्बत ना जाने क्यूं  खफ़ा  मुझसे  मेरा ख़ुदा हो गया,,! शिद्दत से चाहा जिसे वही मुझसे ज़ुदा हो गया,,!! एक हम है कि  हम किसी और के हो ना सके,,! एकवो है किसी और केसाथ शादीशुदा हो गया,!! कैसे कह दूँ मैं  उसकी मोहब्बत को मुकम्मल,,! मुझसे किये वादें तोड़कर  जो बेजुबाँ हो गया,,!! मोहब्बत  जो   की   हमनें  तो  ज़ुर्म  हो गया,,! वो करके  बेदाद-ए-इश्क़* बे-गुनाह  हो गया,,!! छोड़   दी   वो   राह - ए - मोहब्बत मैनें अब,,! जिन  राहों  पे "दिलवरिया" गुमशुदा हो गया,,!! बेदाद-ए-इश्क़ = प्रेम का ज़ुल्म/ अत्याचार __विपिन दिलवरिया

कहां चले नज़रें चुराकर ( Shayari ) __ Vipin Dilwarya

कहां चले नज़रें चुराकर कहां चले नज़रें चुराकर खुश हो पीठ में खंज़र घुसाकर  जैसे भी हो अपनें हो बख्श देते है अपना समझकर चालाकियाँ समझते हो जिन्हें हमारी मोहब्बत है वरना लहरें भी लौट  जाती है किनारों से टकराकर __विपिन दिलवरिया 

Part - 7 - Thoughtfull Shayari __ Vipin Dilwarya

        Part - 7 - Thoughtfull Shayari (1) सहरा तरस रहा है ये बादल है कि  समंदर पे बरस रहा है (2) उस्ताद नहीं हुँ मानता हुँ मगर जैसे को तैसा समझाना बखूबी जानता हुँ (3) पढ़ के देख मुझको समझ लेगा मेरे शब्दों में तु ख़ुद को पा लेगा (4) शायरी का एक दौर जा रहा है राहत नहीं पूरा इन्दौर जा रहा है (5) जीस्त-ए-शायरी का खाज़ाना जा रहा है!! कोई रोको  राहत का ज़नाज़ा जा रहा है!! (6) तेरे मज़कूर लफ्ज़ तुझे आबाद रखेगी,,!! ये दुनियाँ है जब तक तुम्हें याद रखेगी,,!! (7) सुख़न से महरूम रह गयी वो महफ़िल,,,,!! जिसमें शहर के सारे सुख़नवर शामिल थे.!! (8) बुढ़ापा है नज़र धुंधला गई आँखों की पतझड़ है इसमें क्या ख़ता शाख़ों की (9) किसे सुनाऊँ मैं अपनी कहानी किसी के पास वक्त नहीं... एक कलम कुछ पन्ने बस लिख लेते है जज़्बात और कुछ नहीं... __विपिन दिलवरिया

आँखों पर पट्टी बाँधकर बैठे है ( हिन्दी कविता ) __ विपिन दिलवरिया

आँखों पर पट्टी बाँधकर बैठे है  आँखों पर पट्टी बाँधकर  बैठे है पढ़ लिखकर  गवांर बन बैठे है सही गलत की पहचान कैसे हो मानसिक गुलाम जो बन बैठे है गुलामियत खून में  है  उन लोगों के जो देशभक्त के नाम पे अंधभक्त बन बैठे है हिन्दु मुस्लिम भाईचारे की बात करते है फिर  क्यो   हिन्दु   मुस्लिम  चिल्लातें है भाईचारे की मिसाल देते है जो वही धर्म के ठेकेदार बन बैठे है राजनीति का कोई धर्म नहीं है नफ़रत  उन  लोगों  से  है  जो धर्म के नाम पे नेता बन बैठे है गाय नाम  पर   राम  नाम  पर बस राजनीतिक रोटी सेकतें है नफ़रत  उन  लोगों  से  है  जो गाय नाम पे व्यपार कर बैठे है सही को  सही  गलत  को गलत कहने  की  हिम्मत  रखता  हुँ मैं सपा,बसपा , भाजपा से मतलब  नहीं मुझे,नफ़रत उन लोगो से है  जो गाय  के  दलाल  बन  बैठे है बात ना कर भगवे रंग और प्रभु राम की भगवा...

बुढापा लगा है मौत बुलानें में ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

बुढापा लगा है मौत बुलानें में तलवे   घिस   गये  आने  जानें में उम्र  गुज़र  गयी  जिसे  कमानें में ज़िन्दगी भर  जो  कमाई  इज़्जत अपनें    ही   लगे  उसे   गवानें में     पाल     पौशकर     बड़ा    किया  जिसको  वजूद  दिया   ज़मानें में क्या    किया     है     मेरे    लिये एक पल  ना  लगा उसे  सुनानें में    शाम - ए - हयात   ढल      गयी    औलाद   को   कुछ     बनानें  में अरमानों   का   गला   घोट  दिया जिसनें दो वक्त की रोटी कमानें में   मूँह का निवाला भी उसे खिलाया  पर टुकड़ा दे ना सका वो खानें में ज़वानी बुलाती  रही ज़िन्दगी मगर बुढापा  लगा   है   म...

Part - 5 - Love shayari __ Vipin Dilwarya

                        Part - 5 - Love shayari (1) जाते हुए को टोकना कैसा आते हुए को रोकना कैसा और ज़माने का डर नहीं हमको बस तुम्हारे इकरार का इंतज़ार था अब तुम आ गये हो तो सोचना कैसा (2) ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से मिला दिया मेरे टूटे दिल के हर टुकडें को दिल से लगा लिया खो गया था दूनियाँ की भीड़ में कहीं उसनें मुझे मुझसे मिला दिया (3) मेरे अश्क मोहब्बत की निशानी है ना मानो तो बहता पानी है फ़कत ये अल्फाज़ नहीं ये गज़ल मेरी कहानी है बस पा ना सका मैं उसको मेरी मोहब्बत में आज भी रवानी है (4) लफ्ज़ो को मैनें स्याही में भीगो दिया जज्बतों को पन्नो की गहराई में डुबो दिया ये मौसम बरसात का तो नहीं ये मौसम भी आज बे मौसम रो दिया कुछ तो हुआ है बेवजह नहीं ये हलचल इन बादलों में लगता है आज फिर किसी सच्चे आशिक़ ने अपनी मोहब्बत को खो दिया (5) छुपा हुआ चेहरा तेरा सामनें आ जाये बारिश की बूँदें जैसे तेरी पायल खनक जाये मेरी धड़कन थम जाये मेरी सांसे रुक जाये छुपा हुआ चेहरा तेरा सामनें आ जाये (6) पान...