ख़ुद को बदनाम भी कर दिया ( गज़ल ) __विपिन दिलवरिया

 ख़ुद को बदनाम भी कर दिया 


कोई  नाता ना  था जिसका  मैखानें से

उसनें वहाँ अपना मुक़ाम भी कर दिया


ज़ाम के नाम से  भी  अनजान  था जो

उसने   ज़ाम  पे  ज़ाम  भी  कर  दिया


जितना   बचाया  था   ज़मानें   भर  से 

उसनें  ख़ुद  को  सरेआम भी कर दिया


चाहत जो भी हुई पाने की, उसके लिये

उसनें  सुबह  को  शाम  भी  कर  दिया


लाख कोशिशे  की  समझानें  की मगर

जो ना करना था वो काम भी कर दिया


जितना किया  था  नाम  ज़मानें भर में

उसनें  ख़ुद को  बदनाम भी  कर दिया 


आँख     खुली     तो     ऐसी     खुली 

उसनें यहाँ सब कुछ दान भी कर दिया


इतना आसाँ   नहीं  किसी की फितरत 

को     समझना     यहाँ    "दिलवरिया"


बचाकर लाया था जो मुझे ज़मानें भर से

उसने  ही  कत्ल-ए-आम  भी  कर  दिया



मुक़ाम - पड़ाव , घर 


__विपिन दिलवरिया ( मेरठ )


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