कदम-कदम पे आफ़त हो जाती है ( गज़ल ) __विपिन दिलवरिया


 कदम-कदम पे आफ़त हो जाती है 



खामोश रहता हुँ तो  खिलाफ़त हो जाती है
बोलनें लगता  हुँ  तो  अदावत* हो जाती है

मेरी  तकदीर   मेरे  खिलाफ़   इस  कदर है
मैं साँस  भी लेता  हुँ  तो आहट हो जाती है

झूँठ की  ताजपोशी करती है दुनियाँ , यहाँ
सच बोलने  वालों  की बगावत हो जाती है

ये कलयुग  है  यहाँ  ईमानदारी  को मनाही 
और  बेईमानी  को   इजाज़त  हो  जाती है

मरते देखा है  मैनें सच्चे  इश्क़ में लोगों को
कैसे करू सच्चा  इश्क़  आदत हो जाती है

राह-ए-दहर*इतनी आसाँ नहीं "दिलवरिया"
इसमें  कदम - कदम पे आफ़त हो जाती है


__विपिन दिलवरिया 


बगावत  -  विद्रोह
अदावत  -  शत्रुता , दुश्मनी
राह-ए-दहर - जीवन का मार्ग
मनाही  -  मना करने का भाव

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