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ना छेड़ किस्सा-ए-मोहब्बत ( गज़ल ) ( Shayari ) __ विपिन दिलवरिया

ना छेड़ किस्सा-ए-मोहब्बत सितारों   की   नुमाईश   लगी   है, ये हसीं  रात  अब  खिलने लगी है तेरे   आने   की   खबर  हुई  जब, तेरी      खुशबू       से  मेरी   बगिया    महकनें   लगी  है वो  आये  जब   मेरी   गली , मेरी सूनी   गलियाँ   चहकनें   लगी  है जो  थमी  हुई  थी ,  तेरे  आने  से  वो  धड़कन  अब  धडकनें लगी है ना    छेड़   किस्सा - ए - मोहब्बत, मेरी  ख्वाहिशें  अब  बढ़ने लगी है ना देख  मोहब्बत  भरी  नज़रों से ये  चिंगारी  अब  भड़कनें  लगी है अधुरी  मोहब्बत थी  "दिलवरिया" वो मोहब्बत अब पूरी होने लगी है __विपिन दिलवरिया 

Part - 6 - Thoughtfull Shayari ___विपिन दिलवरिया

    Part - 6 - Thoughtfull Shayari (1) ख्वाहिशें उतनी रखो ज़िन्दगी में जितने में खुश रह सको वरना  ज्यादा ख्वाहिशें खुशियों को  बर्बाद  कर  देती है (2) डूबना चाहता हुँ मैं समन्दर की गहराई में... ये समन्दर है कि मुझें साहिल पर ले जानें में लगा है... (3) ज़िन्दगी का सफ़र यूं कट जाता है जब हमसफर हमसा मिल जाता है (4) सुखे हुए पत्ते से पुछो गिरने का डर क्या होता है वरना  शाक  तो  पतझड़  का  इंतज़ार करती है (5) झूँठो की दूनियाँ में बेइमानों की बस्ती है साहब यहाँ लोग दूसरों के घरों में झाँकतें है... और बेइमानी खून में है जिनके वो हमसे ईमानदारी के सबूत माँगते है... (6) वक्त के थपेडों नें कभी इस पार तो कभी उस पर किये... मुश्किल वक्त में कुछ नें वार किये तो कुछ नें उपकार किये... आज मैनें अपनी किताब  से   कुछ  पन्ने  बाहर  किये... शुक्र है तेरा कोरोना, कुछ लोगों के तूने मुखोटे उतार दिये... (7) हौंसलों  से  आस्माँ  चूम  लेता है हो अरमाँ तो अंधेरो...

उन्हें खबर नहीं ( Shayari ) __ विपिन दिलवरिया

                          उन्हें खबर नहीं खूब मिले खरीददार  हम कहां बिकने वाले है वो छिपनें वाले सोचते है हम कहां दिखने वाले है उनकी हरकतें उनके मिज़ाज़ खूब देखें हमनें उन्हें खबर नहीं हम  उनपे गज़ल लिखनें वाले है __विपिन दिलवरिया 

सजी हुई चिता से उतारा शव (आगरा प्रकरण जातिवाद का घिनौना रूप) ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

   सजी हुई चिता से उतारा शव    (आगरा प्रकरण जातिवाद का घिनौना रूप) ये  कौन  लोग   इतनें  ज्ञानवान  है एक जात तुच्छ एक जात महान है ऊँच - नीच   जात - पात   में  बटाँ  ये कौन सा धर्म कौन सा इन्सान है मिट्टी बांट दी  , बांट दी इंसानियत और  कहते  है  मेरा  देश महान है सजी  हुई  चिता   से  उतारा  शव, ये  कौन  लोग  कौन  से इन्सान है कैसे कह दूँ मैं उस धर्म को अपना जहाँ जातिवाद  में बटें शमशान है नहीं मानता  वो  धर्म "दिलवरिया" जहाँ इंसानियत नहीं बस हैवान है  __विपिन दिलवरिया 

ज़िन्दगी क्या है ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

ज़िन्दगी क्या है ज़िन्दगी क्या है इसको किसने जाना है ? ज़िन्दगी क्या है इसको किसने जाना है ? ना जाने कब कौन कैसे सही गलत और गलत सही बन जाता है ज़िन्दगी में सब कुछ भूल कर अपनें बेहतर कल के लिये अपनें आज को बर्बाद कर जाता है ज़िन्दगी क्या है इसको किसने जाना है ? ऐसा दौर भी आता है यहाँ  अपना पराया, पराया अपना बन जाता है कभी ख़ुद को तो कभी  दूसरों को समझाना पड़ता है कुछ रिश्तें कुछ जिम्मेदारियों के लिये  इन्सान को खुदगर्ज़ बन जाना पड़ता है कई पहलु है इस ज़िन्दगी के कुछ रिश्तें हमें निभातें है  कुछ रिश्तों को हमें निभाना पड़ता है ज़िन्दगी क्या है इसको किसने जाना है ? कुछ रिश्तों के लिये जीना पड़ता है कुछ रिश्तों के लिये ख़ुद मर जाना पड़ता है ये ज़िन्दगी अनसुलझी पहेली है ज़िन्दगी खत्म हो जाती है जब तक इन्सान ज़िन्दगी को समझ पाता है ज़िन्दगी क्या है इसको किसने जाना है ? ज़िन्दगी क्या है इसको किसने जाना है ? __विपिन दिलवरिया 

ये इश्क़ कोई गुनाह नहीं ( gazhal ) ( Shayari ) ___विपिन दिलवरिया

     ये इश्क़ कोई गुनाह नहीं त्याग भी है मोहब्बत बस पाना नहीं, आग का दरिया है  इश्क़ आसाँ नहीं फूलों की रहों  पे  भी  कांटे  बिछे है, दूरियाँ भले हो फासलें हो जाना नहीं बड़े नसीबों से मिलती  है  मोहब्बत  यूं  ही  कोई  बिखरा  खज़ाना  नहीं शितम  ढाती   है  मजबूरियाँ  मगर, सब कुछ भूले  पर  याद आना नहीं यूं  बदनाम  ना  कर  मोहब्बत  को,  मोहब्बत ज़िन्दगी है मर  जाना नहीं माना दुश्मन ज़माना इश्क़ का मगर, इबादत है  ये इश्क़ कोई गुनाह नहीं मोहब्बत ख़ुदा बख़्श है"दिलवरिया" किसी का लिबाश  या  गहना  नहीं ख़ुदा बख़्श -  ख़ुदा का उपहार __विपिन दिलवरिया 

हर गज़ल एक सवाल बनेगी ( Ghazal ) __ विपिन दिलवरिया

हर गज़ल एक सवाल बनेगी   हुआ  सबेरा  तो  साँझ  भी ढ़लेगी है खास अगर , वो आम भी बनेगी सूनापन  सा  है  मेरी  ज़िन्दगी  में कभी तो  ज़िन्दगी गुलज़ार  बनेगी मेरी  तन्हाई   आज   मज़बूरी  है,   यही   ज़िन्दगी  की   ढाल   बनेगी शोला  बन  भड़केगी  एक चिंगारी, ये हल्की हवा  अब  तुफ़ान  बनेगी कर   संकल्प    उठाई   जो   मैनें, मेरी  कलम  मेरी  आवाज़  बनेगी क्रूतियाँ  चुनकर  लिखुंगा  समाज  की, हर गज़ल  एक सवाल बनेगी अनजानें  में  चोट  खायी है  मगर, यही चोट सवालिया निशान बनेगी हर  हरफ़  में  एक  कहानी  होगी यही   गज़लें   मेरी   आन   बनेगी चल पड़ा हुँ  धुंधली  सी  रहों  पर  यही  रहगुज़र  मे...