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हँसता खेलता परिवार बड़ा खुश था ( हिन्दी कविता ) __विपिन दिलवरिया

हँसता खेलता परिवार बड़ा खुश था एक  खोली थोडा  दु:ख था सबका  साथ  बड़ा सुख था माता - पिता     और     भाई - बहन हँसता खेलता परिवार बड़ा खुश था खूब  कमाई    धन    दौलत  ज़िन्दगी के  दु:ख  छँट  गये घर आई  भौजी  बहन  गई ससुराल  एक पौध तो लगाई पर पेंड़ कट गये खूब सजा था  'शाखें गुल सा' उस घर के सारे फूल छँट गये रिश्ते बरसते थे जिस आस्माँ से मगर आज  रिश्तो  के सारे बादल छँट गये जग  नाम था जिन रिश्तो का वो रिश्ते बस नाम के बच गये हाथ फैल  गया  बन्द मुट्ठी खुल गई फैल गई आँगनाई पर चूल्हे बँट गये खोली बन गयी  कोठी मगर सबके  यहाँ  कमरे  बँट  गये थी गरीबी रिश्ते अनमोल थे "दिलवरिया" आई अमीरी  तो रिश्तो  के मोल घट गये __विपिन दिलवरिया ( मेरठ )

कदम-कदम पे आफ़त हो जाती है ( गज़ल ) __विपिन दिलवरिया

  कदम-कदम पे आफ़त हो जाती है  खामोश रहता हुँ तो  खिलाफ़त हो जाती है बोलनें लगता  हुँ  तो  अदावत* हो जाती है मेरी  तकदीर   मेरे  खिलाफ़   इस  कदर है मैं साँस  भी लेता  हुँ  तो आहट हो जाती है झूँठ की  ताजपोशी करती है दुनियाँ , यहाँ सच बोलने  वालों  की बगावत हो जाती है ये कलयुग  है  यहाँ  ईमानदारी  को मनाही  और  बेईमानी  को   इजाज़त  हो  जाती है मरते देखा है  मैनें सच्चे  इश्क़ में लोगों को कैसे करू सच्चा  इश्क़  आदत हो जाती है राह-ए-दहर*इतनी आसाँ नहीं "दिलवरिया" इसमें  कदम - कदम पे आफ़त हो जाती है __विपिन दिलवरिया  बगावत  -  विद्रोह अदावत  -  शत्रुता , दुश्मनी राह-ए-दहर - जीवन का मार्ग मनाही  -  मना करने का भाव

किसे पता था मिट्टी अन्धेरें में जला दी जायेगी ( Justice_For_ManishaValmiki ) ( हाथरस गैंग रेप प्रकरण ) __विपिन दिलवरिया

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   किसे पता था मिट्टी अन्धेरें में जला दी जायेगी     ( Justice_For_ManishaValmiki )      ( हाथरस गैंग रेप प्रकरण ) किसे  पता  था  ये   घड़ी  विकट  बन जायेगी कुछ   गन्दी   नज़रें   मेरे  ऊपर  तन   जायेगी किसे   पता   था   आबरू   लूट   ली  जायेगी  गला काटकर  रीढ  की  हड्डी  तोड दी जायेगी पहले  नोच   नोचकर  खाया   सबने  मुझको किसे पता  था  बाद  जीभ  काट  दी  जायेगी खूब   लड़ी    मैं    ज़िन्दगी   मौत   से   मगर किसे पता था  ज़िन्दगी , मौत  से हार जायेगी दिन  के   उजालो   में  लुटी  थी  मेरी  आबरू किसे पता था मिट्टी अन्धेरें में जला दी जायेगी फिर होगी बहस  फिर  ह...

सोशल मीडिया वरदान है या अभिशाप ( निबंध ) ( लेख ) __विपिन दिलवरिया

                  सोशल मीडिया वरदान है या अभिशाप 21 वीं सदी , सोशल मीडिया का नया दौर यह एक विशाल नेटवर्क है सोशल मीडिया दुनियाँ के लोगों को एक जगह मिलानें का कार्य करता है। सोशल मीडिया हमारे जीवन में एक बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है जिसके द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी बहुत ही सरलता व सहजता से लोगों तक बहुत तेजी से पहुंचाने का एक शशक्त संचार माध्यम है। लेकिन सोशल मीडिया को लेकर बहुत सारे तर्क-वितर्क किये गये है इसको लेकर कुछ लोगों ने इसे वरदान के रूप में देखा है तो कुछ लोगों ने इसे अभिशाप कहा है। सोशल मीडिया की सकारात्मकता :- * सोशल मीडिया किसी भी प्रकार की घटनाएं, समाचार एवं जानकारी प्राप्त करने में मदद करता है और इसके द्वारा बहुत कम समय में जानकारी को लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। * सोशल मीडिया लोगों को जोडनें का कार्य करता है यह समाज के सामाजिक विकास में अपना योगदान देता है, इसके माध्यम से किसी भी मुद्दे पर लोगों के मध्य आसानी से वार्ता की जा सकती है। * समाज में होने वाली क्रुतियों के प्रति जागरुकता फैलानें के लिये यह एक अच्छ...

Part - 8 - Thoughtfull Shayari __ Vipin Dilwarya

        Part - 8 - Thoughtfull Shayari (1) एक एक ईंट से मिलकर मकान बनता है,,,!! और छोटी-छोटी कोशिशों से ही इन्सान महान बनता है,,,!! (2) मेरी कहानी मेरी नहीं तुमसे मिलकर बनी है बिछड़कर लिखी थी कुछ शायरियाँ आज पूरा शहर कहता है तुमसा कोई सुख़नवर नहीं है (3) कल कहीं नहीं कल एक धोखा है जो करना है करले आज मौका है (4) पैसों से मकान बनाया जा सकता है,,,!! "घर" बनानें के लिये परिवार की जरुरत पडती है,,,,,!! पैसों  से  डर  बनाया  जा सकता है,,,!! "इज़्जत" बनानें के लिये व्यवहार की जरुरत पडती है,,,,!! (5) स्याही बनकर तकदीर ज़िन्दगी के पन्नो पे इस तरह बिखरी कुछ पन्ने सँवर गये कुछ कोरे रह गये ख्वाबों की दूनियाँ से कुछ सपनें चुराये थे मैनें कुछ अधुरे रह गये कुछ पूरे हो गये (6) "ज़िन्दगी",,,,,,,,क्या ये सीरत है,,? सूरत-ए-आईना खूब दिखाते थे,,,!! "हक़ीकत",,,,क्या ये ज़िन्दगी है,,? ख्वाब तो बड़े हसीन दिखाते थे,,,!! (7) बुरा आदमी को कहता हुँ ना औरत को कहता हुँ बुरा मैं  सिर्फ गंदी  मानसिक सोच  को कहता हुँ ...

ज़िन्दगी भी मुकर गई ( शायरी ) __विपिन दिलवरिया

                    ज़िन्दगी भी मुकर गई  ज़िन्दगी  की  तलाश  में ज़िन्दगी गुज़र गई  दौडता  रहा  घड़ी  का  पहियां ताऊम्र मेरे साथ  वक्त   पड़ा   घड़ी   भी  साथ छोड़कर निकल गई  गुमाँ  करता   रहा  उम्र  भर  जिस  ज़िन्दगी पर एक उम्र आई तो हमसे  ज़िन्दगी  भी  मुकर गई  __विपिन दिलवरिया 

बात खानदानी करता हुँ ( शायरी ) __विपिन दिलवरिया

                   बात खानदानी करता हुँ इंसानों से मैं बात इंसानी करता हुँ बद्जुबानों से मैं बात बद्जुबानी करता हुँ अपनी औकात से जो बाहर बात करते है उनसे मैं  बात  खानदानी करता हुँ रूह से मोहब्बत उसको रास ना आई आज कल उनसे मैै बात ज़िस्मानी करता हुँ __विपिन दिलवरिया