सुन री हवा तू धीरे चल ( गीत ) __गाज़ी आचार्य ' गाज़ी '

  सुन री हवा तू धीरे चल ( गीत )



सुन री हवा तू धीरे चल

उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है.......


                   सज संवरकर निकली है वो

                   यहाँ सारा चमन महक रहा है 


                   सौन्दर्य ऐसे सोलह श्रृंगार जैसे

                   मानो चाँद ज़मीं पर चमक रहा है 


सुन री हवा तू धीरे चल

उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है.......


                           || 1 ||


                   माथे बिन्दीयाँ आँख में अंजन 

                   नाक में नथुनीं  हाथ में कंगन


                   कान में झुमका चाल में ठुमका

                   देख उसे हर कोई बहक रहा है


गालो की लाली होठों की प्याली 

उसके चेहरे पर नूर बरश रहा है


सुन री हवा तू धीरे चल

उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है.......


                           || 2 ||


                    जिसनें देखा जी भर के 

                    वो बचा है यारो मर मर के


                    सांस की सुरभि बाल में गजरा

                    चंदन सा बदन महक रहा है


देख पतित हुआ वो पावन

उसका यौवन इतना चहक रहा है


सुन री हवा तू धीरे चल

उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है.......


                           || 3 ||


                   गुलशन में गुल खिल जाये 

                   जब उसके चेहरे पर मुस्कान आये 


                   ऊपर से ये दूध दशन 

                   जैसे अब्धि में मुक्ता चमक रहा है


तारीफें सारी कम लगती है

जितनी जो भी कर रहा है


सुन री हवा तू धीरे चल

उसके सर से दुपट्टा सरक रहा है.......



__गाज़ी आचार्य ' गाज़ी ' 



अब्धि - सागर

मुक्ता  - मोती

सुरभि - खुशबू

दशन - दाँत


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