मेरे सर पे चढ़ने लगी है ( Shayari ) by Vipin Dilwarya


मेरे सर पे चढ़ने लगी है



इश्क़ किया था जिस चहरें से
अब  वो  सूरत  बदलने  लगी  है

उंगली पकड़कर चलना सिखाया
हमने, वो आज हमें चलाने लगी है

दायरा मोहब्बत का सिमटकर रह गया
उसकी ख़्वाहिशें ज्यादा जगने लगी है

माना तोहफ़ें लेना देना इश्क़ का दस्तूर है
मगर अब उसकी फर्माईशे बढ़ने लगी है

लगता है इश्क़ की हदें ज्यादा बढ़ गई
आज कल वो मेरे सर पे चढ़ने लगी है





__ विपिन दिलवरिया

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