समन्दर भी सूख जाते है (Shayari) by Vipin Dilwarya



समन्दर भी सूख जाते है




बढ़ते  कदम  भी  रुक  जाते  हैं
जब अपनों के साथ छूट जाते हैं


ये मौसम  अगर साथ ना दें तो
हवाओं के रुख भी मुड़ जाते है


ना हस्ती ना हैसियत, ये वक्त है
बड़ों - बड़ों के सर झुक जाते हैं


पानी का एक कतरा भी बगावत पर
आ जाये, तो समन्दर भी सूख जाते है



__विपिन दिलवरिया


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